क्या करूँ मुझे लिखना नही आता…

क्या करूँ मुझे लिखना नही आता

क्या करूँ मुझे लिखना नही आता
लिखना आता तो लिख देता सब की किस्मत में खुशी
सब के चेहरे पर मुस्कान ला कर ही मैं सब्र पाता
उदास हूँ क्योकिं एसा कुछ मै कर नहीं पाता
क्या करूँ मुझे लिखना नही आता

एक रोते हुए बच्चे को देख कर
एक माँ की खामोश चितकार सुन कर
मैं अपनी आँखे कान बँद कर लेता हूँ
मुझसे एसी वेदना का चित्रण तक भी नहीं किया जाता
क्या करूँ मुझे लिखना नही आता

नहीं सही जाती मुझसे किसी इन्सान की किसी दूसरे पर हुकुमत
कैसे दब कर रह जाती है एक आम आदमी की हर हसरत
दिल तो करता है कि सबको इस नर्क से छुटकारा दिला दूँ
पर उन्हे जन्नत पहुँचाने के लिए उन्हे मार भी नहीं पाता
क्योंकि उनकी मौत का फैसला लिखने का साहस तक नहीं जुटा पाता
क्या करूँ मुझे लिखना नही आता

लिखना तो बहुत कुछ चाहता हूँ मैं
लिखना आता तो मैं भी लिखता हँसती हँसाती एक कविता
या लिख देता किसी की लहराती ज़ुलफों की तारीफ मे कुछ पक्तियाँ
लिखता कि किसी की बातों से गुनगुनाती हैं ये फिज़ाएँ
किसी की मुस्कुराहट की खिलते फूलों से तुलना मै कर पाता
पर क्या करूँ मुझे लिखना नही आता

पर फिर सोचता हूँ कहीं लिख ना देता कुछ एसा
जिस से मुझ पर कोई स्वार्थ का आरोप लगा जाता
मेरे अच्छे इरादों को शायद कोई समझ ही ना पाता
किसी का दर्द बाटँते समय कहीं कोई मुझे लालची तो ना कह जाता
ये सोच कर मैं बस यही हूँ कह जाता
अच्छा है कि मुझे लिखना नहीं आता
मुझे लिखना नहीं आता…

‘ आपकामित्र ‘ गुरनाम सिहं सोढी