टविटर की महफिल में "ग़म" पर लिखे कुछ शब्द


ग़मों को भी रख तू अपने सिर आँखों पर,
खुदा ने मुसीबत दी है तो हिम्मत भी वही देगा
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ग़म के दिन आए हैं तो खुशी के भी आएँगें,
वक्त का उसूल है कि ये कहीं रुकता नहीं,
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ग़म हो खुशी अपनों के बिन सब अधूरे हैं,
हँसने के लिए साथी चाहिए और रोने के लिए काँधा
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शीशा-ए-ग़म उसने तोड़ा जिसके हाथ में पत्थर था,
हैरत क्या इसमें, सच्चाई भी कई बार आँसु सुखा देती है
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मेरे अपने भी मुझसे दूर जाने लगे, शायद ग़मों का सिलसिला आने वाला है,
पराए भी अपने से लगने लगे, दिल में कोई घर करने वाला है,
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हज़ारों ग़म थे, अब हर ग़म दवा नज़र आता है,
गुनाह की नगरी में वजूद खोने लगा मेरा,
अब क़ातिल भी खुदा नज़र आता है,
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ग़मों की शाम थी, या तन्हाई थी, बड़ी मुद्दत बाद तू याद आई थी,
बारिश ने क़ैद की थी सोच हमारी, या चाँद ने साज़िश रचाई थी
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किसी की जुदाई को ग़म की वजह ना कहो ऐ दुनिया वालो,
कहते हैं जुदाई ज़रुरी है प्यार बढ़ाने के लिए,
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दुआ में पूछ रहा था खुदा से कि क्या ये ग़म-ए-जुदाई हमेशा रहेगा साथ,
जाने किसने पीछे से आमीन कह दिया
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किसी को ग़म जुदाई का, कोई तड़प रहा है तन्हाई में,
मुहब्बत मिले तो भी ग़म है, जो ना मिले तो भी आराम नहीं,
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ग़म नहीं मुझे इस बात का कि तुझे पा ना सका,
अफसोस ये कि तुझे अपने दिल की बात भी कह ना सका,
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ग़म तुम्हारे ले के जीये जा रहे हैं,
जो कोई खुशी दे देते तो शायद मर ही जाते,
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तुम्हे ग़म है कि सब कुछ नहीं तुम्हारे पास,
और देखो वो आराम से सो रहा है जिसके पास कुछ भी नहीं,
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कहते हैं कि इश्क में ग़म बहुत मिलते हैं,
ना इश्क हुआ, ना ग़म मिला,
खुद को खुशकिस्मत कहें या बदकिस्मती की शिकायत करुँ मैं,
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ज़िन्दगी में एक दो ग़म क्या आए, तुम तो रोने लगे,
छोड़ो किसी से मुहब्बत करना तुम्हारे बस की बात नहीं,
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क्यों तुझे लगता है कि हर ग़म एक सा है,
हर नए साज़ पे तारों की आवाज़ बदल जाती है,
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मुझसे मत पूछ, अपने दिल को टटोल तू,
गर कोई ग़म ना मिले तो समझना कि मुहब्बत नहीं हुई अभी
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मेरे ग़मों का कारण भी वही निकला,
जो कहता था कि तुम खुश बहुत अच्छे लगते हो

‘आपकामित्र’ गुरनाम सिहं सोढी
१४ अक्तूबर, २०११
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2 thoughts on “टविटर की महफिल में "ग़म" पर लिखे कुछ शब्द

  1. सदा says:

    मेरे गम का कारण भी वही निकला,जो कहता था‍ कि तुम खुश बहुत अच्‍छे लगते हो …वाह बहुत ही अच्‍छी प्रस्‍तुति ।

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