एक छोटे बच्चे की हँसी हँसना चाहता हूँ…

मैं एक छोटे बच्चे की हँसी हँसना चाहता हूँ
उस मासूमियत को अपने चेहरे पर हमेशा रखना चाहता हूँ

ये बनावटी चेहरे, धोखे से भरी आँखों से खुद को आज़ाद करना चाहता हूँ
हर नफरत, हर दुश्मनी को बस एक मुस्कान से प्यार मे बदलना चाहता हूँ

कहीं इज्ज़त, कहीं पैसा तो कहीं दुनिया मे उड़ी हैं रातों की नीदें
इन सब चिन्ताओं को छोड़ एक बच्चे की तरह सोते हुए मुस्कुराना चाहता हूँ

सोचते थे कब बड़े होगें, अपने पैरों पर खड़े होगें
आज जब बड़े हो गए हैं, तो फिर से घुटनों के बल रेंगना चाहता हूँ

वो तोतली बोली, वो माँ की गोद मे सो जाना, पल मे नाराज़ होना और अगले ही पल मान जाना
फिर से उसी भोलेपन को अपने अन्दर लाना चाहता हूँ

अपनी गली मे पड़े उस मिट्टी के ढेर पर खेलना चाहता हूँ
इस शोर से दूर माँ के आँचल मे खो जाना चाहता हूँ

वो लुक्का छिप्पी के खेल हमेशा खेलना चाहता हूँ
हाँ, मै हमेशा एक बच्चा बना रहना चाहता हूँ

‘आपकामित्र’ गुरनाम सिहं सोढी
१९ मार्च, २००७

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