सपनों में मुलाकात

कल रात तुम मेरे सपने में थीं,
बेचैन सी हो कर बुला रही थीं मुझे,
अपने सपने में आने के लिए,
शिकायत थी तुम्हारी,
कि मैं कभी तुम्हारे सपने में क्यों नहीं आता,
“तुम्हारा दिल ही नहीं करता ना मुझसे मिलने को”,

कोशिश की थी मैने,
तुम सो रही थी,
पर मैं जानता नहीं कि सपनों में जाते कैसे हैं,
तुम्हारी नींद गहरी थी,
नहीं तो तुमसे ही पूछ लेता धीरे से,
और तुम इशारे से कोई रास्ता बताती,
और फिर नींद में ही मेरा नाम लेती,
और मैं जान जाता कि मैं तुम्हारे ख्वाबों में हूँ,

पर नहीं,
तुम्हारी नींद बहुत गहरी है,
थोड़ी बेचैन भी सी हो तुम,
धड़कनें भी तेज़ हैं,
जैसे किसी के पीछे भाग रही हो,
या जैसे कोई ट्रेन छूट रही हो,
उसी नींद में तुम आवाज़ देती हो मुझे,

याद आया,
तुम कोशिश कर रही हो मेरे सपने में आने की,
पर मैं अपनी कोशिश में जागता ही रह गया,
तुम वक्त की बहुत पाबंद हो,
मुझे भी समय से सोने की आदत डालनी चाहिए,
हैना?

‘आपकामित्र’ गुरनाम सिहं सोढी
१७ जनवरी, २०१२

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3 thoughts on “सपनों में मुलाकात

  1. Arrey abhi to maza aana laga tha panktiyon ka aur abhi fasaana khatam bhi ho gaya..

  2. jaldi khatam kar di maine?

  3. Pallavi says:

    भावपूर्ण रचना ….समय मिले कभी तो आयेगा मेरी पोस्ट पर आपका सवागत है http://mhare-anubhav.blogspot.com/

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