फलदार पेड़

समय बहुत तेज़ी से बदलता है,
और उस से भी तेज़ लोगों की ज़रुरतें,
पर इन ज़रुरतों को पूरा करने के लिए
कोई मेहनत नही करना चाहता,
सब फल तो खाना चाहते हैं,
पर बीज कोई नहीं बोता,

कोई पेड़ लगाता भी है तो
नीम का, बरगद का,
और कुछ तो मनी-प्लांट की बेल से ही खुश हैं,
कोई फलदार पेड़ नहीं लगाता,
फलदार पेड़ों की देख-रेख बहुत महँगी है,
जितना मीठा फल
उतनी ही खाद,
उतना ही पानी,
और गली के बच्चों के उतने ही पत्थर,

फल आते हैं तो चिड़ियाँ आती हैं,

बहुत गंद फैलाती हैं,
और फिर इन्तज़ार भी तो बहुत करना पड़ता है,
इसलिए पेड़ लगाते हैं बस छाया के लिए,
या घर में हरियाली महसूस करने के लिए,
फल तो बाज़ार से भी मिल जाते हैं,

प्यार भरा दिल रखना भी फैशन में नहीं है,
दिल में जितना प्यार,
उतना ही लोगों से लगाव,
लोगों के दु:ख में उतना ही दु:ख,
उतने ही दिल को ठेस पहुँचाने वाले लोग,
और बदले में किसी का प्यार मिलता ही कितना है,
लोग प्यार जताते हैं बस कोई मतलब निकालने के लिए,
या सोसाईटी में दिखावे के लिए,
हाँ पर प्यार बाज़ार में नहीं मिलता फलों की तरह,

चाहे प्यार भरे निश्छल दिल हो,
या फिर फलदार पेड़,
सबने सिर्फ सुना है कि हुआ करते हैं,
किसी गाँव में शायद,
या हज़ारों में किसी एक पुराने ख्याल वाले घर में,
पता नहीं ऐसा कुछ होता भी है या नहीं…

‘आपकामित्र’ गुरनाम सिहं सोढी
५ फरवरी, २०१२

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5 thoughts on “फलदार पेड़

  1. sabne sirf sunaa hai ki hua karte the…aisa hii samay aane waalaa hai….bahut sundar.

  2. Sunil Kumar says:

    बहुत सुंदर भाव संजोये है…..

  3. Pallavi says:

    सार्थक प्रस्तुति …समय मिले कभी तो आयेगा मेरी पोस्ट पर आपका स्वागत है

  4. हाँ, फल तो सबको खाना है पर पेड़ कोई नहीं लगाना चाहता है। आलस्य हम सबके जीवन का अभिन्न अंग बन चुका है जो आपसे रिश्तों में भी अब साफ नज़र आने लगा है..

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