मन कुछ खोया खोया रहता है


 

मन कुछ खोया खोया रहता है,
उछलता है ज़रा सी खुशी मिलने पर,
और अकेले होने पर उदास हो जाता है,
कुछ तो है जो ये हर वक्त ढूँढता है,
मन कुछ खोया खोया रहता है

कभी किसी अन्जान को भी समझ लेता है अपना,
कभी अपनो से भी दूर रहता है,
छुपाता है सबसे अपना हाल कभी,
कभी बात करने के लिए एक दोस्त ढूँढता है,
मन कुछ खोया खोया रहता है

कभी बचपन मे जाना चाहता है,
कभी जवानी का प्यार पाना चाहता है,
कभी सोचता है कि जी लिया बहुत,
कभी सब कुछ फिर से शुरु करना चाहता है,
जाने क्या चाहता है, जाने क्या करता है,
मन कुछ खोया खोया रहता है

तारीफ का भूखा है,
कोई करे तो हवा में उड़ने लगता है,
प्यार का प्यासा है,
कहीं से मिले तो उसी ओर चल पड़ता है,
रूठ जाए कोई इससे तो,
बच्चे की तरह ज़मीन पार पैर पटकने लगता है,
कभी झूमता है किसी अन्जाने अंहकार में,
कभी भगवान से शिकायत ये करता है,
कभी टिकता नहीं एक जगह पर ये,
ये मन कुछ खोया खोया रहता है,

पीड़ा हो तन की,
या कोई उलझन हो किसी प्रियजन की,
अपनी रातों की नींद ये खोता रहता है,

लालची है खुशियों और अपनेपन का,
हर पल कुछ खोजता रहता है,
पर अन्तर नहीं समझता सपने और सच्चाई में,
सच्चाई को देख अपनी आँखें ये बंद करता है,
झूठ की उम्र खत्म होते ही,
अकेला बैठ कर ये रोता रहता है,
ये मन कुछ खोया खोया रहता है।।।

‘आपकामित्र’ गुरनाम सिहं सोढी
२७ फरवरी, २०१२

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One thought on “मन कुछ खोया खोया रहता है

  1. आहा हा!क्या अच्छी लगी यह कृति.. बहुत ही साधारण शब्दों में गहरे विचार इस मन के उथल-पुथल को दर्शाते..बहुत ही अच्छा लगा..

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