Happy Birthday SKB

फरिश्तों में विश्वास रखते हो?
मैं रखता हूँ,
अक्सर मेरी दिल की बात सुनने,
मुझसे समझने आ जाता,
पहले अक्सर आया करता था,
फिर कुछ कम हो गया उसका आना,
कहता था कि उम्र हो चली है उसकी,
जो माँगना है अभी माँग लो,
फिर ना जाने कब मुलाकात हो,
मैं उदास हो गया,
कहा मुझे कुछ नहीं चाहिए,
मुझे चाहिए तो बस कुछ अपनापन,
सच्चाई किसी रिश्ते में,
किसी बच्चे का सा भोलापन,
कर सको तो इन्तज़ाम करो,
उसका जिसे कह सकूँ मैं अपना,
और जो माने मुझे अपना,

सोच में पड़ गया वो भी,
कुछ घबरा गया शायद,
कुछ ज़्यादा ही माँग लिया मैनें,
या सब कुछ जो उसके पास था,
या हो सकता है उसी को उसी से माँग लिया मैने,

पर कहते हैं कि पीछे नहीं हट सकते वो,
पूरा करना ही पड़ता है अपना वादा उनको,

और अचानक पता नहीं क्या हुआ,
वो मुस्कुराया,
और अचानक गायब हो गाया,
दिखा नहीं मुझे तब से,
वैसे मुझे तुम उसी दिन मिली थी,
तो तुम्हारा भी उस से कोई रिश्ता हुआ ना,
उसे ढूँढने में मेरी मदद करो।
क्या कहा? कैसा है वो?
क्या कहूँ….
बस तुम जैसा।

‘आपकामित्र’ गुरनाम सिहं सोढी
२७ मार्च, २०१२

मेरी बहन अनुराधा शर्मा के लिऐ उनके जन्मदिन पर

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लिखने का बहाना ढूँढता हूँ

मैं लिखने का इक बहाना ढूँढता हूँ,
यूँ कि मिलने का बहाना ढूँढता हूँ,

यूँ तो मुश्किल है तुमसे मिलना शायाद,
इन लफ्ज़ों में बीता ज़माना ढूँढता हूँ,

तुम्हारी हर बात है इक कविता मेरे लिए,
अपनी कविता में तुम्हारी कोई निशानी ढूँढता हूँ,

मतलब निकालता हूँ तुम्हारी किसी पुरानी बात का,
खामोशी में भी कोई अनकहा अफसाना ढूँढता हूँ,

दोस्तों से भी मिलता हूँ कभी तो,
उनकी बातों में भी ज़िक्र तुम्हारा ढूँढता हूँ,

कभी तुम्हारी नाराज़गी, कभी तुम्हारी रुसवाई का डर,
कभी गलतफ़हमी  तो कभी अनचाही दूरी,
फिर यूँ मिलना कि जैसे कुछ हुआ ही ना हो,
वही बचपना मैं खुद में पुराना ढूँढता हूँ,

भटकता हूँ एक अन्जान मुसाफिर की तरह,
अपनी ओर बुलाता हुआ तेरा एक ईशारा ढूँढता हूँ,

वो कहते हैं कि तू मुझसे बहुत दूर है,
पहुँच नहीं सकती मेरी आवाज़ तुम तक,
मेरी दीवानगी की तुम्हे खबर दे सके,
मैं ऐसा कोई लफ्ज़ दीवाना ढूँढता हूँ,

मैं लिखने का इक बहाना ढूँढता हूँ।

‘आपकामित्र’ गुरनाम सिहं सोढी
२१ मार्च, २०१२

मन की उथल पुथल

कोई कविता नहीं,
कोई ख़्वाब नहीं,
कोई साज़ नहीं,
कोई आवाज़ नहीं,

बस एक सन्नाटा है,
चारों तरफ एक खामोशी छाई है,
बहुत लोग हैं आस पास,
फिर भी दिल में तन्हाई है,

मन को घेरा है कुछ यादों ने,
आँखों में बसे कुछ अधुरे ख़्वाबों ने,
खुद से किए कुछ वादों ने,
कुछ नामुमकिन से लगते ईरादों ने,

लगा कि दिल की बात का इज़हार करूँ,
या शायद थोड़ा और इन्तज़ार करूँ,
ढ़ूँढ लूँ कुछ शब्द अपने भीतर से,
फिर कलम के ज़रिए इकरार करूँ,

पर इकरार करूँ तो किस से,
सब लगते यहाँ अन्जान हैं,
शायद वो भी मेरी तरह,
खुद से ही परेशान हैं,

पर फिर भी लिख देता हूँ कुछ ऐसा,
जिस से खुशी झलके,
दिल का बोझ घटाते
दो चार लफ्ज़ हल्के फुल्के,
प्यार के दो शब्द,
जिन्हें पढ़ के मुस्कुरा उठें भीगी पलकें,

क्योंकि कविता है,
तो ख़्वाब हैं,
शब्द हैं तो आवाज़ है,
उँगलियाँ अगर बजाना चाहें,
तो कलम भी इक अनोखा साज़ है,

अकेले में ही साथ मिलता है शब्दों का,
साथ हैं शब्द तो फिर कैसी तन्हाई है,
मुझे अकेला देख के,
मेरी कविता पूरी महफिल साथ लाई है

‘आपकामित्र’ गुरनाम सिहं सोढी
२ मार्च, २०१२