एक कविता तुम्हारे नाम

कैसे तुमको मन की बात बताऊँ,
क्या कह कर मन का राज़ जताऊँ,
दिल करता है पुराना सब मिटा कर,
एक नई कविता तुम्हारे नाम लिख जाऊँ,

ये पुराने शब्द, कुछ चुराए, कुछ अपनाए,
कुछ पक्तिंयों में अपने भाव छुपाए,
उनको छोड़ दूँ, कुछ नया बनाऊँ,
एक नई कविता बस तुम्हारे लिए लिख जाऊँ,

कुछ विषय थे जिनपर मेरा अब हक़ नहीं,
कुछ रिश्ते थे जिनमें अब कोई चमक नहीं,
अगर मंज़ूर हो तो एक नया रिश्ता तुम्हारे साथ बनाऊँ,
तुम्हे सामने बिठा के तुम पे लिखता चला जाऊँ,

तुम्हे पंसद हो या नापसंद हो तुम मुझे बतलाना,
गर कुछ गलत कहूँ तो भले ही नाराज़ हो जाना,
अपने मन को निर्मल और स्वच्छ बना कर,
तुम्हे मनाने को एक कविता और लिख जाऊँ,

पुरानी कविताएँ, पुरानी यादें कहीं छोड़ आऊँ,
तुम साथ दो तो नए किरदार बनाऊँ,
तुम मुझे अपनी कहानी में थोड़ी जगह दो,
मैं अपनी कविताएँ तुम्हे दे जाऊँ,

कहते हैं कि कविता में झूठ नहीं बोला जाता,
तो सोचा दिल की बात यूँ ही तुमसे कह जाऊँ

‘आपकामित्र’ गुरनाम सिहं सोढी
२८ मई, २०१२

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नदी किनारे बैठी एक लड़की

नदी किनारे बैठी एक लड़की,
फिर भी उसे कुछ प्यास थी,
बार बार डुबोती अपने हाथों को पानी में,
शायद किसी लहर को पकड़  लेने की आस थी,

हर लहर को अपना साथी समझती,
उस से बातें करती,
उस में अपना अक्स देखती,
उस से कुछ सवाल पूछती,
फिर वो लहर जब दूर जाने लगती,
तो वो उसे रोकने के लिए हाथ उठाती,
पर फिर खुद को रोक लेती,
उसे जाने देती,
समझ जाती कि वो लहर नहीं रुकेगी,

फिर वो एक कंकर उठाती,
याद है उसे प्यासे कौए की कहानी,
जिसकी प्यास इन कंकरों ने ही बुझाई थी,
क्या उसकी प्यास ये बुझाएँगे,
एक एक कर कंकर नदी में फेंकती है,
पर कोई फायदा नहीं,
नदी की भी ज़िद्द है शायद,
उन कंकरों से या शायद उस से,

अकेले बैठी सोचती है,
चाँद से बातें करे या इस हवा से,
या अपने घोंसलों की ओर लौटते पक्षियों से अपना सवाल पूछे,
पर नहीं,
नदी और कंकर उसे निराश कर चुके हैं,
आज वो और निराश नहीं होना चाहती,
उठती है और चल देती है घर की ओर,
पर मन में फिर भी एक सोच,
कि शायद चाँद दे पास उसके लिए कोई जवाब होता।।।

‘आपकामित्र’ गुरनाम सिहं सोढी
२२ मई, २०१२

nadi kinare baithi ek ladki,
phir bhi use kuch pyaas thi,
baar baar duboti apne hatho ko pani me,
shayad kisi lehar ko pakad lene ki aas thi,

har lehar ko apna sathi samajhti,
us se baatein karti,
us me apna aks dekhti,
us se kuch sawaal puchti,
phir wo lehar jab door jane lagti,
to wo use rokne ke liye hath uthati,
par fir khud hi ruk jati,
use jane deti,
samajh jati ki wo lehar nahi rukegi,

phir wo ek kankar uthati,
yaad hai use pyase kauwe ki kahani,
jiski pyaas in kankaro ne bujhayi thi,
kya uski pyaas ye bujhayenge,
ek ek karke kankar nadi me fenkti hai,
par koi fayda nahi,
nadi ki bhi zidd hai shayad,
un kankaro se ya shayad us se,

akele baithi sochti hai ki,
chaand se baatein kare ya is hawa se,
ya apne ghonslo ki aur lautate pakshiyon se apna sawaal puche,
par nahi,
nadi aur kankar use nirash kar chuke hain,
aaj wo aur nirash nahi hona chahti,
uthati hai aur chal deti hai ghar ki aur,
par man me phir bhi ek soch,
ki shayad chand ke paas uske liye koi jawaab hota….

🙂 aapkamitrgss
Gurnam Singh Sodhi
22nd May, 2012

वो नादान लड़की

एक नादान सी लड़की,
अपनी ही दुनिया में मस्त,
आँखों में एक भोली सी शरारत,
बातों में एक लखनवी नज़ाकत,
खुद हमेशा मुस्कुराती,
अपनी बातों से सबका दिल जीत जाती है,
उसकी कोई चुलबुली सी शरारत पकड़ी जाए तो,
बच्चों की तरह आँखें बंद कर मुँह छुपा लेती है,

वो नादान सी लड़की,
अपनी दुनिया में अकेली रहती है,
अकेले ही उसमें घूमती है,
अपने छोटे से बैग में जाने क्या क्या भरा है उसने,
कुछ उम्मीदें,
कुछ सपने,
कुछ जो टूट गए थे,
उन सपनों के कुछ टुकड़े,
साथ ही रखे हैं कई पल संजो कर,
जो वो बिताती है खुद के साथ कई बार,
जिन्हे जीती है वो बार बार,
और कुछ कवितएँ, कुछ कहानियाँ,
जो लिखी हैं अपने अकेले पलों में,
अपनो को याद करके,

किसी और को हिस्सा नहीं बनाती अपनी कहानी का,
कहती है कि किरदार बढ़ जाएँ,
तो कुछ ठीक नहीं रहता,
किरदार अपने मन की करते हैं
और उसका मन दुखाते हैं,

ये कहानियाँ वो लिखती भी खुद है,
और पढ़ती भी खुद है,
अपनी कहानी पढ़ा कर वो किसी को उदास नहीं करना चाहती,
वो तो बस सब को खुश देखना चाहती है,

मैं जब भी उसकी आँखों में देखना चाहूँ,
तो आँखे झुका लेती है,
मैं बस ये जानता हूँ कि वो खूबसूरत हैं,
पर उनमें है क्या, ये बहुत कम लोग जानते हैं,

वो कहती है कि मैं उसकी कहानी का हिस्सा नहीं बन सकता,
कहती है कि ज़रुरत नहीं है,
ना उसे मेरी, ना मुझे उसकी,
और मैं बस ये कहता हूँ कि,
उसका हर बार सही होना ज़रुरी तो नहीं,

‘आपकामित्र’ गुरनाम सिहं सोढी
१७ मई, २०१२

ek nadaan si ladki,
apni hi duniya me mast,
aakhon me ek bholi si shararat,
baato me ek lakhnawi nazakat,
khud hamesha muskurati,
apni baaton se sabka dil jeet jati hai,
uski koi chulbuli si shararat pakdi jaye to,
bacho ki tarah aakhein band kar munh chupa leti hai,

wo nadaan si ladki,
apni duniya me akeli rehti hai,
akele hi usme ghoomti hai,
apne chote se bag me jane kya kya bhara hai usne,
kuch ummeedein,
kuch sapne,
kuch jo toot gaye the,
un sapno ke kuch tukde,
sath hi rakhe hain kai pal sanjo kar,
jo wo bitati hai khud ke sath kayi baar,
jinhe jeeti hai wo baar baar,
aur kuch kavitayein, kuch kahaniyan,
jo likhi hai apne akele palo me,
apno ko yaad karke,

kisi aur ko hissa nahi banati apni kahani ka,
kehti hai ki kirdaar badh jayein
to kuch theek nahi rehta,
kirdaar apne man ki karte hain,
aur uska man dukhate hain,

ye kahaniyan wo likhti bhi khud hai,
padhti bhi khud hai,
apni kahani padha kar wo kisi ko udaas nahi karna chahti,
wo to bas sab ko khush dekhna chahti hai,

main jab bhi uski aakhon me dekhna chahu,
to aakhein jhuka leti hai,
main bas ye janta hoon ki wo khoobsurat hain,
par unme hai kya, ye bahut kam log jaante hain,

wo kehti hai ki main uski kahani ka hissa nahi ban sakta,
kehti hai ki zarurat nahi hai,
na use meri na mujhe uski,
aur main bas ye kehta hoon ki,
uska har baar sahi hona zaruri to nahi

:)aapkamitrgss
Gurnam Singh Sodhi
17th May, 2012

लिखने का हक़

हाथ में कलम लिऐ बैठा है वो,
कुछ लिखना चाहता है,
किसी के बारे में,
पर सोच रहा है,
क्या उसे हक़ है उसके बारे में लिखने का,
वो हक़ अब किसी और का है,
अब वो उस पर कुछ नहीं लिखेगा,
कभी नहीं,

कभी वो खिड़की के बाहर झाँकता है,
तो कभी कमरे के फर्निचर को घूरता है,
फिर मेज़ की दराज़ में रखी तस्वीरों में कुछ खोजता है,
कहीं तो कोई विषय मिलेगा कुछ लिखने के लिए,
शायद अखबार में ही कुछ मिल जाए,

फिर कुछ सोच कर रुक जाता है,
एक बार उसने कहा था,
“अगर लिखने के लिए कुछ ढूँढना पड़े तो मत लिखो”
पर आज उसे कुछ लिखना है,
उसका मन बहुत बेचैन है,

डायरी के पन्ने पलटता है,
कुछ अधूरी कविताओं की उम्मीद बँधती है,
एक कविता पढ़ कर उसमें एक लाईन जोड़ता है,
फिर मिटा देता है,
अधूरी कविता फिर अधूरी रह गई,

फिर एक नए पन्ने पर कुछ लिखता है,
एक बच्चे के बारे में,
उनकी मासूमियत हमेशा साथ देती है,
उनके भोलेपन के बारे में लिखते लिखते,
उसकी मासूमियत याद आ जाती है,

वो फिर रुक जाता है,
फिर सोचता है,
उसने ये भी कहा था कि
“शब्द अगर खुद बह रहे हों तो उन्हे रोकना नहीं चाहिए”
और वो फिर लिखने लग जाता है,
उस पर एक नई कविता…

‘आपकामित्र’ गुरनाम सिहं सोढी
१२ मई, २०१२

hatth me kalam liye baitha hai wo,
kuch likhna chahta hai,
kisi ke bare me,
par soch raha hai,
kya use haq hai uske bare me kuch likhne ka,
wo haq ab kisi aur ka hai,
ab wo us par kuch nahi likhega,
kabhi nahi,

kabhi wo khidaki ke bahar jhankta hai,
to kabhi kamre ke furniture ko ghoorta hai,
fir mez ki daraaz me rakhi tasveeron me kuch khojta hai,
kahin to koi vishay milega kuch likhne ke liye,
shayat akhbaar me hi kuch mil jaye,

fir kuch soch kar ruk jata hai,
ek baar usne kaha tha,
“agar likhne ke liye kuch dhoondhna pade to mat likho”
par aaj use kuch likhna hai,
uska man bahut bechain hai,

diary ke panne palatata hai,
kuch adhoori kavitaon ki umeed bandhati hai,
ek kavita padh ke usme ek line jodta hai,
fir kuch soch kar use mita deta hai,
adhoori kavita fir adhoori reh gayi,

fir ek naye panne par kuch likhta hai,
ek bache ke bare me,
unki masumiyat hamesha saath deti hai,
unke bholepan ke bare me likhte likhte,
uski masumiyat yaad aa jati hai,

wo fir ruk jata hai,
fir sochta hai,
usne ye bhi kaha tha ki
“shabd agar khud beh rahe ho to unhe rokna nahi chahiye”
aur wo phir likhne lag jata hai,
us par ek nayi kavita

:)aapkamitrgss
Gurnam Singh Sodhi
12th May, 2012

The Forged Genius By Nimai Joshi

Genre: Fiction
Date Read: 1st May, 2012
Overall Rating: 4/5
The Forged genius is a book by Nimai Joshi, an Engineer, a genius himself. The book is about a lot of things. College life, love, drug addiction, life and search for happiness in general.
Summary:
The story is about Arjun, whose childhood is disturbed due to his fighting and addict parents. He curses his life but then learns to ignore such things and move on with his life. In the process he becomes indifferent towards life. In college, he gets addicted to drugs. Meanwhile does find happiness in many things, but the loss of such things kept on making him like a machine and more addicted towards drugs. But then he finds the love of his life. A nice job, getting his friends back in life, family. But life again takes a turn and everything seems lost again.
With such ups and downs, the genius in Arjun keeps finding his way out.
My Views:
The book is written in exceptionally well manner with a story full of turns and twists but still very close to reality. The writing is full of witty and sarcastic sentences and incidences. The book is written by an engineer which depicts in many places with beautiful and easy explanation to many simple things. The symbolic references like the child learning tables, indifference towards life are a charm in the book. The genius and the instinct of the main character really impresses the reader and shows the intelligence of the author.
Conclusion:
A lovely book. Quite Under-rated. Deserves a applause.