शी लवस मी, शी लवस मी नॉट

ये मन भी अजीब दीवाना है,
कोई नहीं है आस पास,
फिर भी किसी से बतियाता है,
बिना किसी के कुछ कहे,
जाने क्या कुछ सुन जाता है,

निसदिन किसी से बातें करना आदत है इसकी,
खुद के सवाल और अपने मुताबिक ही जवाब,
खुद ही कुछ लिखता हे,
और फिर खुद को सुना कर खुश हो जाता है,

बिना लव के लव स्टोरी लिखता है,
एक अक्स को अपनी प्रेयसी बताता है,
पहली मुलाकात भी बाकी है अभी,
और जीवन संग बिताना चाहता है,

दुनिया अपनी राह चल रही,
ये अपनी दुनिया बसाता है,
मुस्कुराता है, फिर हँसता है खुद पे,
यूँ ही कोई मीठा गीत गुनगुनाता है,

सोचता है कि क्या होता जो पहले मिले होते,
किसी गली के कोने, किसी स्कूल या कॉलेज में,
फिर झटक देता है ऐसे ख्याल अपने अंदर से,
पिछला सब छोड़ आगे का सोचने लगता है,

कहानी बुनता है कि जब वो मिलेगा उससे,
क्या कहेगा, क्या ना कहेगा,
डरता है कुछ पूछने से,
बस “she loves me, she loves me not” रटता रहता है

‘आपकामित्र’ गुरनाम सिहं सोढी
१४ जून, २०१२

अपना हाथ दिखाओगी?

वो घर से निकली थी कुछ लाने के लिए,
बाज़ार में गाती गुनगुनाती वो जा रही थी,
अचानक आवाज़ आई,
बेटी, आओ तुम्हारा हाथ देखता हूँ,
कोई सवाल हो मन में तो उसका जवाब बोलता हूँ,

मेरा हाथ़!!!! मेरा हाथ देख कर क्या करेंगें?
क्या स्कूल के मास्टर जी की तरह
ये देखेंगें कि नाखून ठीक से कटे हैं या नहीं,
या गणित के मास्टर जी की तरह
बिना गल्ती के छड़ी से मारोगे,
या बाबूजी की तरह
मेरे हाथ पे एक रुपए का सिक्का रख दोगे?

अरे नहीं!
मैं तुम्हारा हाथ देखकर
ये बताऊँगा कि तुम्हारे कल में क्या है,
कितने रंग और कितनी खुशियाँ हैं,
दुनिया में कहाँ कहाँ जाओगी,
कौन थामेगा तुम्हारा ये प्यारा सा हाथ,
किसके साथ तुम घर बसाओगी,
कहो, जानना है ना या ये सब तुम्हे,

वो खिल खिलाकर हँस पड़ी,
नहीं,
मेरे कल में क्या है वो आज जानकर क्या करुँगी,
मुझे माँ ने क्या लाने को कहा था,
वो भी ठीक से याद नहीं,
तो ज़िन्दगी के रास्ते कहाँ याद रहेंगें मुझे,
और जिसे मेरा हाथ थामना होगा,
वो उसे ही सोचने दीजिए,

और रही खुशियों और रंगो की बात,
तो ये देखिए,
उसने पास में पड़े सूखे फूल को उठाया,
और दोनो हाथों में प्यार से मसल दिया,
वो फूल उसके हाथ को रंगीन कर गया,
देखिए, मेरे हाथों में तो रंग ही रंग हैं,
और चेहरे पे खुशी ही खुशी,

और वो फिर खिल खिला कर हँस दी
और हवा के झोंके की तरह चल दी कहीं,
वो पण्डित भी ये कह पड़ा,
यूँ ही खुश रहो बेटी।।।।।

‘आपकामित्र’ गुरनाम सिहं सोढी
११ जून, २०१२

कुछ लिखूँ? पर किसके लिए?

मैं भी चाहता हूँ कि हुस्न कि हुस्न पे गज़ल लिखूँ,
किसी कि सुन्दरता पे कविता कह जाऊँ,
ख्वाबों में किसी से मुलाकात करूँ,
अपनी शायरी किसी से नाम कर जाऊँ,

पर मैं पहले अपने इश्क को नाम देना चाहता हूँ,
अपने शब्दों को उस से मिलवाना चाहता हूँ,
मेरे ख्वाब अपनी मंज़िल तक पहुँचे,
इसलिए उन्हें उन आँखों का पता देना चाहता हूँ,

मेरी शायरी को कोई पढ़ने वाला हो,
दिल की बात को कोई सुनने वाला हो,
लफ्ज़ तो देते हैं कई दिलों पे दस्तक,
पर कोई तो दरवाज़ा हो जो खुलने वाला हो,

किसी पर गर कविता लिखूँ तो वो नाराज़ ना हो,
मेरी नादान बातों से परेशान ना हो,
चौंक जाए वो मेरे अंदाज़-ए-बयाँ पर,
पर मेरे बेबाक इकरार से वो हैरान ना हो,

आस पास एक नहीं हज़ारों अपने हैं,
मगर हर एक के अपने अलग सपने हैं,
कोई हो जो मेरे और मैं जिसके सपनों में समा जाऊँ,
और उसकी अदा पे एक कविता लिखता चला जाऊँ,

पर तब तक मेरा हर लफ्ज़ बेमानी है,
बिना किसी साथी के खेलना भी तो बेईमानी है,
बिना प्रेरणा के किसी बात पे कविता मैं गा नहीं सकता,
केवल कल्पना मात्र से शब्दों को बहला नहीं सकता ।।।

‘आपकामित्र’ गुरनाम सिहं सोढी
५ जुलाई, २०१२