कुछ लिखूँ? पर किसके लिए?

मैं भी चाहता हूँ कि हुस्न कि हुस्न पे गज़ल लिखूँ,
किसी कि सुन्दरता पे कविता कह जाऊँ,
ख्वाबों में किसी से मुलाकात करूँ,
अपनी शायरी किसी से नाम कर जाऊँ,

पर मैं पहले अपने इश्क को नाम देना चाहता हूँ,
अपने शब्दों को उस से मिलवाना चाहता हूँ,
मेरे ख्वाब अपनी मंज़िल तक पहुँचे,
इसलिए उन्हें उन आँखों का पता देना चाहता हूँ,

मेरी शायरी को कोई पढ़ने वाला हो,
दिल की बात को कोई सुनने वाला हो,
लफ्ज़ तो देते हैं कई दिलों पे दस्तक,
पर कोई तो दरवाज़ा हो जो खुलने वाला हो,

किसी पर गर कविता लिखूँ तो वो नाराज़ ना हो,
मेरी नादान बातों से परेशान ना हो,
चौंक जाए वो मेरे अंदाज़-ए-बयाँ पर,
पर मेरे बेबाक इकरार से वो हैरान ना हो,

आस पास एक नहीं हज़ारों अपने हैं,
मगर हर एक के अपने अलग सपने हैं,
कोई हो जो मेरे और मैं जिसके सपनों में समा जाऊँ,
और उसकी अदा पे एक कविता लिखता चला जाऊँ,

पर तब तक मेरा हर लफ्ज़ बेमानी है,
बिना किसी साथी के खेलना भी तो बेईमानी है,
बिना प्रेरणा के किसी बात पे कविता मैं गा नहीं सकता,
केवल कल्पना मात्र से शब्दों को बहला नहीं सकता ।।।

‘आपकामित्र’ गुरनाम सिहं सोढी
५ जुलाई, २०१२

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