Fifty Shades of Grey by E L James

Genre: Fiction, Thriller, Dark Sex
Date Completed: 27th July, 2012
Overall Rating: 3.5/5

Fifty Shades of Grey is the first book of the Fifty Shades Trilogy. It deals with the romance which is full of everything, love, lust, passion, possession. obsession, jealousy, innocence, sex, darkness, everything.  The book is divided in three parts and one part necessarily talks about one set of events. 
Summary:
The story is about Anastesia Steel, an English student in Washington University who goes to interview a young entrepreneur  Christian Grey on behalf of her student editor friend Kate. Grey is very rich, very handsome but a mysterious character. The world knows very little about him. Ana finds herself getting attracted towards him from the very first meeting and so does Grey. Ana thinks the interview went badly but Grey smitten by her charm goes to her store and starts seeing her. They meet again at the University convocation and then at a party afterwords. He invites her out.
But there are secrets of Grey. He tells her that they will have sex only after she signs a contract with him. Ana discovers that he likes sadistic sex and has a “red room of pain” or playroom as he calls it. She is shocked with revelation of such secrets. But she is so in love with him that she doesn’t run away. Rather she slowly accepts him the way he is and is ready to give herself to him. Even Grey starts accepting her wishes and he also surprises himself by wanting more of their relationship.
The book is full of their love/lust stories and their exploration of sexual fantasies. The confusion of an innocent girl and her fight with her conscience is wonderfully described. 
My Views: 
The book is very intriguing, consuming rather. The description of the events (mostly sexual) are given wonderfully. The most attractive part was the inner Goddess of Ana, the most animated character of the book, makes you giggle while showing the mental status of Ana very aptly.
But everything in excess is bad. 75 % of the book is just sex. It feels like we are reading an extend porn story or a collection of porn stories. Describing it in other way in 90% of the book the characters are either having sex or talking about it which is a little turn off. After crossing half mark one tends to start skipping pages which are full of sex and eventually nothing much is missed.
Conclusion:
With so much excess of sex i was tending to give it a two of five. But the language and the way of story telling earns it 3.5 or even a 4. 
Hopes are high as I start reading the second book.

जब मैंने तुमसे कुछ ना कहा था

ख़्वाब बहुत खूबसूरत होते हैं,
पर हमे जल्दी होती है,
उन्हें सच में बदलने की,
और इस कोशिश में
हम तोड़ देते हैं उन्हें
कच्ची कलियों की तरह,
कच्चे घड़ों की तरह,
कच्ची फसल की तरह,
और फिर पछताते हैं,
कि वो ख्वाब कितना हसीन था,

जब मैंने तुमसे कुछ कहा ना था,
तो हर वक्त मन उछलता था
अपनी कल्पना पर,
तुम्हारी हर बात पर,
तुम्हारी हर मुस्कान पर,
ख्वाब और भी रंगीन हो जाते थे
आने वाले कल के,
मेरी कवितायों में तुम्हारी बातें थी,
पंक्तियाँ जो हमेशा हँसती-मुस्कुराती थी,
कोई जब तुम्हारी बात मुझसे पूछता था,
मेरी आखों में एक चमक सी आ जाती थी,
तुम भी सब समझती थी,
फिर भी सब छुपाती थी,

फिर यूँ हुआ कि
मैंने तुमसे सब कुछ कह दिया,
और मेरे ख्वाब तुमने अपनी ना से तोड़ दिए,
एक आईने की तरह,
अब फिर से ये तन्हाई है,
फिर मेरे अंदर एक अजीब सी मायूसी छाई है,
अब तुम बात भी करती हो तो भी लगता है
जैसे ताना दे रही हो,
कोई पूछता है मुझसे तुम्हारे बारे में
तो जैसे तुम ही मुझे चिढ़ा रही हो,
कि मैंने एक गलत ख्वाब देखा था,
जब लिखता हूँ कविता तुम पर,
तो सोचता हूँ कि क्या कोई हक है मुझे?
और लिखता भी हूँ तो
निकलते हैं ‘काश’ जैसे शब्द,
जो अधूरे हैं,
मेरी तरह,
तुम्हारी तरह,

कभी कभी लगता है कि
शायद मैंने भी किसी का दिल दुखाया हो,
जो आज ये हुआ,
फिर सोचता हूँ कि मेरी ही गलती है,
सब ठीक था,
जब तक मैंने तुमसे कुछ ना कहा था,
मेरे ख्वाब में मैं खुश था,
मैंने ही अपने ख़्वाब का अस्तित्व मिटा दिया,
काश कुछ और देर खामोश रह जाता…



‘आपकामित्र’ गुरनाम सिंह सोढी
२६ जुलाई, २०१२

मित्र तुम अब मित्र नहीं रहे

मित्र तुम अब मित्र नहीं रहे,
अब ये तमगा उतार कर फेंक दो,
ना कोई तुम्हारा ना तुम किसी के,
अब ये मुखौटा उतार कर फेंक दो,

सबको अपना समझते हो,
पर कभी किसी के अपने बन न सके,
मिलते रहे सबसे ऊपर ऊपर से,
किसी के दिल में घर कर न सके,
सबसे चाहा प्यार का तोहफा,
पर किसी के प्यार को अपना ना सके,
भटकते रहे तुम इधर से उधर,
एक मंज़िल पर घर कभी बना ना सके,

अब इस सफर में जब तुम तन्हा हो,
यूँ रोना धोना छोड़ दो,
मित्र तुम अब मित्र नहीं रहे,
ये तमगा उतार कर फेंक दो,

ठहाहों का जब शोर था,
एक हुजूम जब चारों ओर था,
उस शोर में तुम खो गए,
लगा तुम्हे कि सब तुम्हारे हो गए,
और जब वो शोर खामोश हुआ,
तुम्हे फिर सच्चाई का होश हुआ,
कोई नहीं जो अब तुम्हारा हो,
तुम किसी का या तुम्हे किसी का सहारा हो,

अपनों को तुमने दूर किया,
अब गैरो को अपना कहना छोड़ दो,
मित्र तुम अब मित्र नहीं रहे,
ये तमगा उतार कर फेंक दो,

जब तक तुम्हे कोई पहचाने ना,
तुम्हारे अंदर के सच को  जाने ना,
दोस्त समझता है वो तुम्हे,
जब तक तुम्हारे खोखलेपन को वो छाने ना,
फिर वो तुमसे दूरी बढ़ाता है,
कुछ देर बात करके चुप हो जाता है,

पुराने दोस्त तुमसे संभलते नहीं,
नए लोगो को छलना छोड़ दो,
मित्र तुम अब मित्र नहीं रहे,
ये तमगा उतर कर फेंक दो,

सुनते हो सबकी तुम,
अपने दिल की किसी से कहते नहीं,
किसी से एक बार जो नाराज़ हुए,
उसके दिल की हालत तुम फिर समझते नहीं,
खुद ही क्या क्या सोचते हो,
किसी से उनकी बात पूछते नहीं,

दूसरों की खुशी से जलते हो तुम,
ना हँसते हो ना किसी को हँसाते हो,
दो पल की मुस्कान के बाद,
फिर उदास हो जाते हो,
जाने क्या चाहते हो सब से,
सबसे क्या क्या उम्मीद लगाते हो,
गर कोई पास आये तुम्हारे,
तो कहीं छुप तुम जाते हो,

गुमसुम गुपचुप रहते हो,
खुद में खोये रहते हो,
किसी से दिल की बात ना करते,
अब ये कविता लिखनी भी छोड़ दो,

मित्र तुम अब मित्र नहीं रहे,
ये तमगा उतार कर फेंक दो,
खुद को ‘आपकामित्र’ लिखना छोड़ दो…

‘आपकामित्र’ गुरनाम सिंह सोढी
२४ जुलाई, २०१२

Before I Go to Sleep by S J Watson

Genre: Fiction, Thriller, Crime,
Date Completed: 17th July, 2012
Overall Rating: 3.5/5
Before I go to sleep is a debut novel by S J Watson. It is a crime based thriller based on a woman who loses her memory every time she goes to sleep. It reminds you of the movie “50 first dates” by Adam Sandler but is quite different.
Summary: 
Christine Lucas wakes up in her room and realizes that some unknown man is sleeping with her. She can not remember how she ended up with an old man in this unknown house. When she goes to the bathroom and looks at the mirror and finds a middle aged woman staring at her, she is terrified. She can not recall anything from her recent years’ past. Then she is reminded by her husband that she had met with an accident and she can not retain her memory. She loses it every time she goes to sleep.
Later she finds out that she had been seeing a doctor for her treatment without knowledge for her husband. He had told her to keep a journal in which she keeps on writing whatever she can recall. And now everyday she reads the journal in the morning, and the information keeps on adding. She also has faint memories of her son, her old friend, old house and her childhood. She also starts recalling the real cause of her condition at present which was not a car accident as her husband tells her.
The novel is written on these lines and how she keeps remembering her past and how she realizes that her husband who tells her about her accident daily has been telling her lies after lies.
My Views:
The novel is nicely written and keeps you gripped to it until you finish it. The feelings of a woman are beautifully described which makes you feel that the author is a woman herself. The incidences are put together in a line very nicely. 
But the theme is not original and you keep going back to the movie which you saw and still can not forget because it was a wonderful love story. But its different. The twists in the book are not surprising. The reader is able to guess the events or the cause or effect of the particular event.
Conclusion:
A nice read in a one go but with not high expectations.

आईये फिर तमाशा देखिये

आईये, आप भी तमाशा देखिये,
बहुत दिन हो गए थे ना,
कुछ रंगीन देखे हुए,
लीजिए, आपके लिए, आप सब के लिए,
एक लड़की की इज्ज़त उतारी जा रही है,
क्या कहा?
रोज़ की बात है?
अरे नहीं! आज रंग ही कुछ और है,
१:२० की रेशो है,
विडियो भी है,

ये देख कर आप अपनी गालियों का पिटारा खोल सकते हैं,
ब्लॉगर अपना ब्लॉग अपडेट कर सकते हैं,
मीडिया वाले एक घंटे के विशेष के २४ कार्यक्रम बना सकते हैं,
छुटभईये नेता सरकार की नपुसंकता को उछाल सकते हैं,
बाबा लोग लड़कियों के छोटे कपड़ों पर टिपण्णी कर सकते हैं,
पाश्चात्य सभ्यता को कोस सकते हैं,
आप FB, twitter पर इस बात को शेयर कर सकते हैं,
और तो और आप इस वीडियो को अकेले में देख करआँखें भी सेक सकते हैं,
सबके लिए कुछ न कुछ है.

क्या कहा?
हमें कुछ करना चाहिए?
अरे छोड़िये, क्या करेंगे आप और हम?
हम बुद्धिजीवी हैं,
इसके अलावा हम कुछ कर भी क्या सकते हैं?
हमारे अंदर गुस्सा तो हैं,
पर पानी के बुलबुले की तरह,
पानी- जिसमे बिल्कुल भी उबाल नहीं,

आज लंबा वाद विवाद होगा,
आरोप मढ़े जाएंगे,
लोगों पर, तमाशगीनो पर, पुलिस पर,
नेताओं पर, फिल्मो पर, माँ बाप पर,
और उस लड़की पर भी,
जो रात को दोस्त का जन्मदिन मानाने गयी थी,

और कल मेट्रो में हम अपनी सीट पर बैठे होंगे,
और किसी लड़की पर जब कोई
जान बूझ कर गिरेगा
तो कुछ लोग हँसेंगे,
और हम सोने का नाटक करेंगें,
और सोचेंगे कि क्या हो रहा है हिंदुस्तान में आज,
कोई कहीं पर सुरक्षित नहीं,
क्योंकि हम बुद्धिजीवी हैं,
बातें करते हैं,
कलम चलाते हैं,
और रोज़ कोई नया तमाशा देखते हैं,
तो आइये,  एक बार फिर ये तमाशा देखते हैं…

‘आपकामित्र’ गुरनाम सिंह सोढी
१३ जुलाई, २०१२

बारिश

मुस्कुराकर धरती ने फिर से ली अंगड़ाई है,
एक अरसे के बाद ये बारिश लौट कर आई है,

सूरज ने सुखा दिए थे कई नदियाँ और तालाब,
समंदर ने उसे बादलों के पीछे खड़े होने की सज़ा सुनाई है,

हवा में न जाने कहाँ से इतनी गर्मी आई थी,
इन बूंदों ने आज इसकी भी अगन बुझाई है,

उदास था जंगल, खामोश थी वादियाँ,
बिजली की ताल पर पत्तों ने फिर बंसी बजाई है,

मिटटी ने अपना साम्राज्य बना लिया था हर पत्ते पर,
बारिश की दो बूंदों से मिटटी की सेना की जान पे बन आई है,

मोर नाचे, बोला पपीहा, गीत गूँजा कोयल का,
चाँद ने चाँदनी में आशिकों और शायरों की महफ़िल सजाई है,

चलो बच्चे बन जायें और किश्तियाँ चलायें इस पानी में,
छपक छपक कर इस पानी में फिर चलने की रुत आई है,

बारिश में भीगा हुआ हर कोई प्यारा लगता है,
सबको एक सा भिगोने की बारिश की ये भी अच्छाई है,

तुम्हारे शहर में रहता होगा मौसम हमेशा खुशगवार सा,
लगा था “नीरज”* की तरह मेरे घर से भी बारिश कि रुसवाई है…

‘आपकामित्र’ गुरनाम सिंह सोढी
१० जुलाई, २०१२

*नीरज –
आज अजब सी शरारत मेरे साथ हुई,
मेरे घर को छोड़ पूरे शहर में बरसात हुई,
– गोपालदास नीरज

The Palace of Illusions By Chitra Banerjee Divakaruni

Genre: Fiction, Mythology
Date Completed: 10th July, 2012
Overall Rating: 4/5
The palace of illusions is narration of Mahabharat in first person with the author trying to see the things how Draupadi would have seen all the events during her life time and how she would be the cause of such time turning historical events.
Summary: 
The author has narrated the story of Panchali, who later on was named as Draupadi. The narration begins with the birth of panchali from the sacrifice fires with her brother Dhrishtidyuman. Her life as a child, her pride, her anger, her expectations, her dreams, her curiosity is explained beautifully in the book. The events of her life which subsequently are influential in changing the history are very simply described in a way that the reader understands how things are not in our full control. Even  when Draupadi knew what she could get into because of her rudeness, even when Vyasa Rishi had warned her that what could happen in the future, she was not able to control anything.
She grows into a young lady and the time of her marriage comes. The events which are known to everyone are described in a way which noone might have thought of till now. How she felt when she was married to five brothers, when she had to leave the palace and live in a forest. Her feelings for Karna are the most beautifully narrated in the book. 
The time continues to unfold the events and the great war of Mahabharat happens. The loss, the urge to undo things but inability to do it, seeing millions of people dying and knowing that you are the reason for everything and history will blame you for all this. the surprises and the mysteries which reveal themselves at appropriate time, all these things are written with utmost care in the book.
My views: 
The book is beautifully written by a female author who was able to interpret and describe how a woman feels. Draupadi’s life, her anxiety, her feelings, her emotions are beautifully described in the book. As the epic is known to everyone, it becomes even more difficult to hold on the the reader as there is very little which would surprise them and it is equally difficult to control the length of the book as describing events from a epic and choosing which one to avoid. But these things are handled nicely in the book. Just one thing which disturbed me as a reader was the lack of dialogues. I didn’t expect dialogues like in a play but Draupadi could have given some sentences to speak. Through out the book it seems that Draupadi only thinks, she does not talk at all as if she is a mute character. 
Conclusion:
Overall, a must read book.Its like seeing epic Mahabharat by BR Chopra with a new angle.