मित्र तुम अब मित्र नहीं रहे

मित्र तुम अब मित्र नहीं रहे,
अब ये तमगा उतार कर फेंक दो,
ना कोई तुम्हारा ना तुम किसी के,
अब ये मुखौटा उतार कर फेंक दो,

सबको अपना समझते हो,
पर कभी किसी के अपने बन न सके,
मिलते रहे सबसे ऊपर ऊपर से,
किसी के दिल में घर कर न सके,
सबसे चाहा प्यार का तोहफा,
पर किसी के प्यार को अपना ना सके,
भटकते रहे तुम इधर से उधर,
एक मंज़िल पर घर कभी बना ना सके,

अब इस सफर में जब तुम तन्हा हो,
यूँ रोना धोना छोड़ दो,
मित्र तुम अब मित्र नहीं रहे,
ये तमगा उतार कर फेंक दो,

ठहाहों का जब शोर था,
एक हुजूम जब चारों ओर था,
उस शोर में तुम खो गए,
लगा तुम्हे कि सब तुम्हारे हो गए,
और जब वो शोर खामोश हुआ,
तुम्हे फिर सच्चाई का होश हुआ,
कोई नहीं जो अब तुम्हारा हो,
तुम किसी का या तुम्हे किसी का सहारा हो,

अपनों को तुमने दूर किया,
अब गैरो को अपना कहना छोड़ दो,
मित्र तुम अब मित्र नहीं रहे,
ये तमगा उतार कर फेंक दो,

जब तक तुम्हे कोई पहचाने ना,
तुम्हारे अंदर के सच को  जाने ना,
दोस्त समझता है वो तुम्हे,
जब तक तुम्हारे खोखलेपन को वो छाने ना,
फिर वो तुमसे दूरी बढ़ाता है,
कुछ देर बात करके चुप हो जाता है,

पुराने दोस्त तुमसे संभलते नहीं,
नए लोगो को छलना छोड़ दो,
मित्र तुम अब मित्र नहीं रहे,
ये तमगा उतर कर फेंक दो,

सुनते हो सबकी तुम,
अपने दिल की किसी से कहते नहीं,
किसी से एक बार जो नाराज़ हुए,
उसके दिल की हालत तुम फिर समझते नहीं,
खुद ही क्या क्या सोचते हो,
किसी से उनकी बात पूछते नहीं,

दूसरों की खुशी से जलते हो तुम,
ना हँसते हो ना किसी को हँसाते हो,
दो पल की मुस्कान के बाद,
फिर उदास हो जाते हो,
जाने क्या चाहते हो सब से,
सबसे क्या क्या उम्मीद लगाते हो,
गर कोई पास आये तुम्हारे,
तो कहीं छुप तुम जाते हो,

गुमसुम गुपचुप रहते हो,
खुद में खोये रहते हो,
किसी से दिल की बात ना करते,
अब ये कविता लिखनी भी छोड़ दो,

मित्र तुम अब मित्र नहीं रहे,
ये तमगा उतार कर फेंक दो,
खुद को ‘आपकामित्र’ लिखना छोड़ दो…

‘आपकामित्र’ गुरनाम सिंह सोढी
२४ जुलाई, २०१२
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3 thoughts on “मित्र तुम अब मित्र नहीं रहे

  1. बहुत सटीक और सही गुरुनाम जी.. 🙂

  2. क्या आपको सच में लगता है कि मुझे आपकामित्र लिखना छोड़ देना चाहिए… मैं इसपे खरा नहीं उतरता???

  3. सदा says:

    बिल्‍कुल नहीं … आपकी लेखन शैली बेहद सशक्‍त हैं आप यूँ ही हमेशा लिखते रहें .. अनंत शुभकामनाऍँ

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