The Wait

The praying lips,
a blank gaze,
her grey hair scattered over a wrinkled face ,
her watery eyes idly watching the road,
sitting on the doorstep,
for her legs are trembling,
almost deaf but still attentive ears,
she hears something,
stands up taking support of knees,
slightly bent,
A shadow from the moonlit night,
enters the house,

her son; drunk and shaky,
pushes her out of the way
and falls half on the bed, half hanging in the air,
she puts his legs on the bed and covers him,
kisses his forehead,
sighs with a relief,
a little smile,
still praying lips; now thanking God,
She lies on the floor
and a tear drops from corner of her eye,
She is a over concerned
she is a rustic mother

🙂 aapkamitrgss
Gurnam Singh Sodhi
30th August, 2012

सच्चे मित्र

उदास चेहरों पर मुस्कान बिखेरते हुए,
कुछ लोग होते हैं ज़िंदगी को मकसद देते हुए,

चेहरे पर चाँद सी ठंडक, होटों पर दुआ,
खुश होते हैं ये दूसरों में खुशियाँ लुटाते हुए,

खुद दुखी होकर भी दूसरों को हँसाते हैं,
मोमबत्ती की तरह खुद पिघलकर सबको रौशन करते हुए,

दुनिया में शायद कोई जुदा नहीं इनसे,
सफर तय करते हैं ये सबके साथ चलते हुए,

उम्मीद की किरण दिखाते हैं निराशा के अँधेरे में,
एक चिराग हैं ये, बुझे चिरागों को लौ दिखाते हुए,

बारिश जैसे सबको एक सा गीला करती है,
चलते हैं ये भी सबको खुशी से भिगोते हुए,

सच्चाई का नूर है, मासूमियत है बातों में,
‘मित्र’ तुम मित्र हो, इन जैसे मित्रों के होते हुए…

‘आपकामित्र’ गुरनाम सिंह सोढी
२८ अगस्त, २०१२

खुशी की गज़ल

चलो आज कुछ अचछा सुनाते हैं,
चलो इस मायूसी को दूर भगाते हैं,

बहुत देर हुई नकली मुस्कान ओढ़े,
चलो आज आईने को हँसाते हैं,

शायद कोई दुकान हो तारों-सितारों की,
चलो इन आखों के लिए चमक लातें हैं,

बहुत वक्त से आया नहीं कोई मिलने,
चलो सबको अपनी याद दिलाते हैं,

नफरतें अकेला कर देती हैं सबको,
चलो इस नफरत को अकेला छोड़ जाते हैं,

कड़वी दवाओं की खुराक है हर रोज़,
चलो सबका मुंह मीठा कराते हैं,

क्यों नहीं लिखता खुशी की गज़लें कोई,
चलो खुशी के दो शेर कह आते हैं,

ख्वाहिशों के चलते ज़िंदगी पीछे रह गयी,
इस फासले को चलो धीरे धीरे घटाते हैं,

सोने चांदी का क्या करेगा कोई,
चलो सबकी खुशी की दुआ कर आते हैं,

किताब की सफ़ेद जिल्द चुभती है आखों में,
चलो फूलों से कह के इसमें कुछ रंग भर आते हैं,

बैठ के सोचने से क्या होगा हासिल ‘मित्र’
जो सोचा है चलो आज कर के दिखाते हैं…

‘आपकामित्र’ गुरनाम सिंह सोढी
२४ अगस्त, २०१२

नदी हो तुम… किसी के लिए रुकना नहीं

नदी हो तुम,
किसी के लिए रुकना नहीं,
बहुत लोग रोकेंगे,
बहुत दिक्कतें आएँगी,
चलती रहना तुम,
किसी के लिए रुकना नहीं,
बच्चो का मुंडन होगा,
खुशी में थमना नहीं,
किसी का अस्थि विसर्जन होगा,
दुखी हो कहीं थकना नहीं,
दो प्रेमी भी मिलेंगे,
उनकी बातें सुनना नहीं,
तुमसे गर कोई कुछ पूछे तो,
दिल की बात कहना नहीं,
नदी हो तुम,
किसी के लिए रुकना नहीं,
पत्थरों से टकराओ तो,
दर्द तुम्हे भी होगा, उन्हें भी,
कहीं रास्ता बदल जाओ तो,
दुःख तुम्हे भी होगा, उन्हें भी,
ऊँचाई से गिरना भी होगा,
गिर कर संभलना भी होगा,
तुम किसी किनारे पे अटकना नहीं,
नदी हो तुम,
किसी के लिए रुकना नहीं,
जवानी में जोश होगा,
किसी की परवाह नहीं,
अधेढ़पन में होश होगा,
पर फिर वो प्रवाह नहीं,
एक परिवार  की तरह,
कोई धारा जुड़ेगी तुमसे
तो कोई तुमसे अलग हो जायेगी,
तुम किसी से कभी जुडना नहीं,
नदी हो तुम,
किसी के लए रुकना नहीं,
बहुत कुछ मिलेगा तुम्हे,
कुछ अच्छा
तो कुछ गन्दगी भी,
कुछ मनचाहा
तो कुछ अनचाहा भी,
रख लेना सब अपने पास,
पर किसी को अपना करना नहीं,
नदी हो तुम,
किसी के लिए रुकना नहीं,
वो समंदर तुम्हारी मंज़िल है,
उसमे मिल तुम खो जाओगी,
खुद को खोने का दुःख मत करना,
खुद खो कर अपने प्रिय को पाओगी,
अकेले जाना है वहाँ तुम्हे,
बाकी सब किनारे पर रह जायेगा,
अपनी हस्ती खोने से डरना नहीं,
नदी हो तुम,
कभी किसी के लिए रुकना नहीं

‘आपकामित्र’ गुरनाम सिंह सोढी
२३ अगस्त २०१२

गज़ल – भटकता हुआ मैं

हमारा क्या है, रतजगे थे, सो गए,
अन्जान मंज़िल की तलाश थी, रास्तों पे खो गये,

कागज़ के उड़ते जहाज़ की तरह हम,
जिस ओर किसी ने उड़ाया, उस ओर हो गए,

जुगनू हैं, चमकते हैं अंधेरों में,
ज़रा सी रौशनी हुई और हम खो गए,

तेज़ हवा के संजोये पत्ते हैं हम,
एक और झोंका आया और हम उसी के हो गए,

उस रास्ते को अपना कह कर चले थे,
आगे चौराहा आया तो बदहवास से हो गए,

किसी दिल के दरवाज़े पर खटखटाते रहे,
जब वो ना खुला तो उसी के दरबान हो गए,

जब भी देखा आईने में, मायूस ही देखा खुद को,
जिस दिन खुश दिखे, खुद पे हैरान हो गए,

इक गज़ल के भटकते शेर से हम,
अपने काफ़िये के हम खुद लुटेरे हो गए,

जिसे चाहा उसे कभी पा ना सके,
आखें अपनी बंद की और वो ख्वाब में मेरे हो गए,

इक रोज़ लगा कि साहिल पे कोई मेरे साथ है,
यकीन होने से पहले रेत में सब निशान खो गए,

एक छोटा आशियाना बनाने को जगह ना मिली,
इस शहर में घर बहुतेरे हो गए,

चलो अब आसमां में मंज़िल की तलाश करें,
इस दुनिया के तो बहुत से फेरे हो गए…

‘आपकामित्र’ गुरनाम सिंह सोढी
२२ अगस्त, २०१२

अभी आज़ादी मिलने में थोड़ा वक्त है

क्या कहा?
देश को आज़ाद हुए ६५ वर्ष बीत गए?
अरे नहीं!
वो तो अंग्रेज आज़ाद हुए थे हमसे,
अभी हमारी आज़ादी में थोड़ा वक्त है,
अभी तो हमारा सब्र बाकी है,
अभी हमारी नींद बाकी है,
आज़ादी से दूर रहने के
अभी और रास्ते बाकी हैं,

अभी देश के प्रति सच्चा प्रेम जागने में वक्त है,
अभी देश की चिंता करने में थोड़ा वक्त है,
अभी हमारी आज़ादी में थोड़ा वक्त है,

अभी हम में और उन लोगों में फर्क है,
जो कुछ भी करने को तैयार थे,
देश के लिए,
समाज के लिए,
जो सच्ची बातें करते थे,
जो उन बातों पे विश्वास करते थे,
हम में अभी बाकी है,
दूसरों में गल्तियाँ निकलने की आदत,
सही रास्ते पर जाने वालों का
रास्ता रोकने की आदत,
जो हमारे लिए आवाज़ उठाएँ
बाकी है अभी उस आवाज़ को दबाने की ताकत,
अभी खुद की आवाज़ निकालने में थोड़ा वक्त है,
अभी हमारी आज़ादी में थोड़ा वक्त है,

गाँधी को रेल से धक्का मारा गया था,
हमे भी विकास की रेल से धक्का मारा जाता है,
“Dogs & Indians are not allowed”
कह के हमे गाली दी जाती थी,
आज भी हमे “third world country”
कह के गाली दी जाती थी,
तब नमक बनाने पर कर था,
आज हर काम के लिए रिश्वत नाम का कर है,
वो लोग जाग गए थे,
हमारे जागने में अभी थोड़ा वक्त है,
हमारी दांडी यात्रा में अभी थोड़ा वक्त है,
जनता की सरकार वो ले आये थे,
अभी जनता का राज आने में थोड़ा वक्त है,
अभी आज़ादी मिलने में थोड़ा वक्त है.

‘आपकामित्र’ गुरनाम सिंह सोढी
१४ अगस्त, २०१२

Happy Birthday – हैप्पी बर्थडे

“मैं देखूंगा”,
“नहीं, मैं देखूंगा, अब मेरी बारी है”
“नहीं, तुम्हारा समय खत्म हो गया
अब मैं देखूंगा”
और यूँ ही तुम्हे देखने की होड़ में,
चाँद और सूरज के इस खेल में,
सुबह से शाम
और शाम से सुबह होती गईं,
और बड़ी जल्दी से ये साल बीत गया,
पर तुम्हारा आईना तुम्हे देखने का लुत्फ़ उठाता रहा,
और तुम्हारे पीछे चाँद और सूरज पर हँसता रहा,

पिछला साल याद करोगी?
यादों की पतली परतें
किताब में रखे एक सूखे फूल सी,
छुओ तो बिखरने लगती हैं,
खुशबू फैलाती हुई इधर उधर,
और कई ख्वाब भी,

यादों की डायरी के पन्ने कुछ खुरदुरे होते हैं,
बहुत कुछ फँस जाता है इनमे,
खोलोगी तो बहुत कुछ मिलेगा इनमे,
कुछ बातें, कुछ मुलाकातें,
कुछ खुशियाँ, कुछ आँसू,
कुछ इंसान, कुछ ख्वाब,
कुछ शब्द, कुछ लम्हे,

एक पन्ने में कहीं मैं भी मिलूँगा,
तुम्हारा एक ख्वाब आखों पर आ गिरा था,
गल्ती से,
संभाल कर रखा है मैंने,

तुम्हारे जन्मदिन पर तोहफा देता तुम्हे मैं कोई,
पर सोच नहीं पाया कि क्या दूँ,
कुछ ऐसा जिसे तुम मना ना करो,
तुम्हे चोकोलेट्स भी तो नहीं पसंद,
क्या दूँ तुम्हे कि तुम्हे ये भी ना सोचना पड़े,
कि इसे वापिस कैसे करूँ,
कुछ नहीं सूझा,
इसलिए बस शुभकामनाएं दे रहा हूँ,

कि जितने समंदर तुम अपने अंदर लिए हो,
उनकी लहरें बस खुशी के छींटे ही दें तुम्हे,
तुम्हारे आस पास सब खुश रहें,
क्योंकि उन्हें खुश देख
ही तो तुम खुश होती हो,
और बस यूँ ही आगे चलती रहो ज़िंदगी में,
बेफिक्र, बेपरवाह और खुश… हमेशा

‘आपकामित्र’ गुरनाम सिंह सोढी
१४ अगस्त, २०१२