गज़ल – इस कदर भी ना सताएं किसी को

इस कदर भी ना सताएं किसी को,
कि बोझ लगने लगें वफाएं किसी को,

नाराज़ हो किसी से और फिर बात भी ना हो,
यूँ भी ना भूल जायें किसी को,

दिल और ज़िंदगी खाली है आपके बिन,
इस तरह अकेला ना छोड़ आयें किसी को,

जानते हैं कि बहुत मसरूफ हो आज कल,
फिर भी दो पल खुशियों के दे आयें किसी को,

आदत हो जाती है किसी को साथ के तुम्हारी.
यूँ तन्हा छोड़ कर तोड़ ना आयें किसी को,

ख्वाब टूटें तो आखों में बहुत चुभते हैं,
जो पूरे ना हो सकें ऐसे ख्वाब ना दिखाएँ किसी को,

माना इश्क मज़हब है मरने वालों का,
पर यूँ जिंदा तो ना दफनाएं किसी को,

हर दिल में माना कि खुदा रहता है ‘मित्र’,
पर ऐसा नहीं होता कि दिल तोड़ कर खुदा मिल जाये किसी को…

गज़ल  लिखने का यह मेरा पहला प्रयास है.. नियमों में या शब्दों के चयन में या किसी और क्षेत्र में कोई कमी हो तो टोकियेगा ज़रूर.. मुझे खुशी होगी.. और मेरी गल्ती बता कर आप मेरी सहायता करेंगे.
धन्यवाद

‘आपकामित्र’ गुरनाम सिंह सोढी
१ अगस्त, २०१२
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4 thoughts on “गज़ल – इस कदर भी ना सताएं किसी को

  1. सदा says:

    वाह …बहुत खूब।

  2. धन्यवाद सदा जी..

  3. dr.mahendrag says:

    माना इश्क मज़हब है मरने वालों का,पर यूँ जिंदा तो ना दफनाएं किसी को,Bahut Sundar

  4. धन्यवाद सर 🙂

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