गज़ल – भटकता हुआ मैं

हमारा क्या है, रतजगे थे, सो गए,
अन्जान मंज़िल की तलाश थी, रास्तों पे खो गये,

कागज़ के उड़ते जहाज़ की तरह हम,
जिस ओर किसी ने उड़ाया, उस ओर हो गए,

जुगनू हैं, चमकते हैं अंधेरों में,
ज़रा सी रौशनी हुई और हम खो गए,

तेज़ हवा के संजोये पत्ते हैं हम,
एक और झोंका आया और हम उसी के हो गए,

उस रास्ते को अपना कह कर चले थे,
आगे चौराहा आया तो बदहवास से हो गए,

किसी दिल के दरवाज़े पर खटखटाते रहे,
जब वो ना खुला तो उसी के दरबान हो गए,

जब भी देखा आईने में, मायूस ही देखा खुद को,
जिस दिन खुश दिखे, खुद पे हैरान हो गए,

इक गज़ल के भटकते शेर से हम,
अपने काफ़िये के हम खुद लुटेरे हो गए,

जिसे चाहा उसे कभी पा ना सके,
आखें अपनी बंद की और वो ख्वाब में मेरे हो गए,

इक रोज़ लगा कि साहिल पे कोई मेरे साथ है,
यकीन होने से पहले रेत में सब निशान खो गए,

एक छोटा आशियाना बनाने को जगह ना मिली,
इस शहर में घर बहुतेरे हो गए,

चलो अब आसमां में मंज़िल की तलाश करें,
इस दुनिया के तो बहुत से फेरे हो गए…

‘आपकामित्र’ गुरनाम सिंह सोढी
२२ अगस्त, २०१२

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6 thoughts on “गज़ल – भटकता हुआ मैं

  1. सदा says:

    वाह … बहुत बढिया ।

  2. शुक्रिया सदा जी 🙂

  3. dr.mahendrag says:

    जब भी देखा आईने में, मायूस ही देखा खुद को,जिस दिन खुश दिखे, खुद पे हैरान हो गए,…….चलो अब आसमां में मंज़िल की तलाश करें,इस दुनिया के तो बहुत से फेरे हो गए…khoobsurat gazal

  4. धन्यवाद सर 🙂

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