सच्चे मित्र

उदास चेहरों पर मुस्कान बिखेरते हुए,
कुछ लोग होते हैं ज़िंदगी को मकसद देते हुए,

चेहरे पर चाँद सी ठंडक, होटों पर दुआ,
खुश होते हैं ये दूसरों में खुशियाँ लुटाते हुए,

खुद दुखी होकर भी दूसरों को हँसाते हैं,
मोमबत्ती की तरह खुद पिघलकर सबको रौशन करते हुए,

दुनिया में शायद कोई जुदा नहीं इनसे,
सफर तय करते हैं ये सबके साथ चलते हुए,

उम्मीद की किरण दिखाते हैं निराशा के अँधेरे में,
एक चिराग हैं ये, बुझे चिरागों को लौ दिखाते हुए,

बारिश जैसे सबको एक सा गीला करती है,
चलते हैं ये भी सबको खुशी से भिगोते हुए,

सच्चाई का नूर है, मासूमियत है बातों में,
‘मित्र’ तुम मित्र हो, इन जैसे मित्रों के होते हुए…

‘आपकामित्र’ गुरनाम सिंह सोढी
२८ अगस्त, २०१२

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12 thoughts on “सच्चे मित्र

  1. Anonymous says:

    Bhaavnayo'n se bhari hui hai aapki Kavita ..Ek Mitr..

  2. shukriya mitr ji 🙂

  3. सदा says:

    भावमय करते शब्‍दों का संगम …

  4. शुक्रिया सदा जी 🙂

  5. बहुत सुंदर…

  6. धन्यवाद निलेश जी 🙂

  7. dr.mahendrag says:

    बारिश जैसे सबको एक सा गीला करती है,चलते हैं ये भी सबको खुशी से भिगोते हुए,sabhi bhavnaien undel di haen Sodhiji,ACHHI RACHNA

  8. shukriya dr sahab 🙂

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