सच से हम डर जाते हैं

रामायण गीता, कुरान,
सब हैं पास,
इन सब की झूठी कसमें खाते हैं,
जाने क्या चोर है मन में,
इस सच से हम डर जाते हैं,

दिल में नफरत,
तो लबो पे मुस्कान,
दिल में मोहोब्बत,
तो आखों में इन्कार,
अपने दिल की बात खुद से छुपाते हैं,
इस सच से हम डर जाते हैं,

आखों में सपना,
पर टूटने का डर,
जो नहीं अपना,
उसे खोने का डर,
जो अपना है
उसे संजोना भूल जाते हैं,
इस सच से हम डर जाते हैं,

कोई करीब आया,
तो डरता है दिल,
प्यार करने से भी
डरता है बुजदिल,
दिलो के कारोबार में,
आखिर क्या होगा हासिल,
खुद को खो चुके थे,
किसी और को मिल जाते हैं,
हम में भी है मासूमियत इतनी,
इस सच से हम डर जाते हैं,

कतरा कतरा टूटते हम,
किस्मत को हर पल कोसते हम,
खुद को अनदेखा करते हम,
अँधेरे में जा छुपते हम,
दिल की सच्ची बातों को
झूठ के पीछे छुपाते हैं,
इस सच से हम डर जाते हैं,

नींव में दीमक,
खोखली दीवारें,
टूटती खिड़कियाँ,
हिलते दरवाज़े,
ऊँची बिल्डिंग में वीरान घर,
उसमें नकली फूल सजाते हैं,
इस सच से हम डर जाते हैं,

खुद पे हँसना भूले हम,
हँस के मिलना भूले हम,
इंसान को भूले, खुदा को भूले,
प्यार, भरोसा सब भूले हम,
झूठे रिश्तों को जीए जाते हैं,
इस सच से हम क्यों डर जाते हैं?

‘आपकामित्र’ गुरनाम सिंह सोढी
२५ सितम्बर, २०१२

रोक दिया

 आखों में पलते ख़्वाबों को रोक दिया,
दिल को फिर से मचलने से रोक दिया,

खुली किताब की तरह थी ज़िंदगी अपनी,
किसी और पन्ने को पलटने से रोक दिया,

वक्त से लम्हे चुरा कर बिताए थे साथ किसी के,
वक्त को किसी के लिए थमने से रोक दिया ,

ज़ख्म जो हैं वो तो भर जायेंगे,
खुद को अब कहीं गिरने से रोक दिया,

कई नज़रों में सवाल दिखते हैं अब भी,
दिल को कोई जवाब देने से हमने रोक दिया,

दीवार सी बना ली है दिल के चारो ओर,
उस दीवार में किसी खिडकी को खुलने से रोक दिया,

इक मुस्कान देख कर आ जाती थी आखों में चमक,
इन आखों को अब कहीं फिसलने से रोक दिया,

क्या खोया, क्या पाया हमने मोहोब्बत में,
दिमाग को ये हिसाब रखने से रोक दिया…

‘आपकामित्र’ गुरनाम सिंह सोढी
२२ सितम्बर, २०१२

मुस्कान

इक मुस्कान के पीछे क्या क्या छुपा रखा है,
अपने दुपट्टे को ही नकाब बना रखा है,

छुपा रहे हैं कुछ बेशकीमती यकीनन,
अपने होटों पे मुस्कान का दरबान बिठा रखा है,

कहीं कोई पढ़ ना ले गीली आखों कि किताब,
ध्यान बांटने के लिए मुस्कान को लगा रखा है,

आखों को तो झूठ बोलना सिखा ना सके,
बाकी चेहरे को इक मुकम्मल इंसा बना रखा है,

हर सवाल का नया जवाब हर बार,
दिल में बहानो का गोदाम बना रखा है,

ये भी नहीं कि सच कहने की हिम्मत नहीं,
फिर भी झूठ को अपना ईमान बना रखा है,

मोहूबत उनको भी है और हमे भी उनसे,
फिर क्यों इक दुसरे को इस से अन्जान बना रखा है.

उनकी बेरुखी का ना पूछो हम पे असर,
दिल की हर महफ़िल को शमशान बना रखा है,

कोई दिया जलाये तो हमे भी उजाला हो नसीब,
इंतज़ार में अपने आँगन को वीरान बना रखा है,

मुस्कुरा के कर को इज़हार-ए-मोहोब्बत,
कहो इस झिझक, इस शर्म-ओ-हया में क्या रखा है,

आखों में उतर जाने दो होटों की हंसी,
इस गम को चेहरे पे क्यों सजा रखा है,

छोड़ो शिकवे और लग जाओ महबूब के गले,
आना की जिद्द में दो दिलों को जुदा रखा है.

‘आपकामित्र’ गुरनाम सिंह सोढी
२१ सितम्बर, २०१२

प्रकृति और पर्यावरण

क्या याद आता है?
प्रकृति शब्द सुनते ही?
बाग बगीचे, रंग बिखेरते फूल और फल,
झरने और बहती नदियाँ कल कल,
चेह्चाहते पक्षी, गुनगुनाती कोयल,
पर कभी खुद को इसका हिस्सा नहीं देखा हमने,
देखा तो बस इन्हें प्यार और अचरज से देखते हुए,
हमारा विवेक भी सच जनता है,

और क्या देखते हैं हम,
पर्यावरण सोचने पर?
प्रदूषण, कल कारखाने,
विलुप्त पक्षी, मरती मछलियाँ,
चारो तरफ गाडियां और धुआं,
और ये सब करते हम,

प्रकृति और पर्यावरण अलग कब हुए,
कैसे रह गया कोई पीछे,
और कैसे दुसरे का ये हाल हुआ,
एक रह गया हमारा सुन्दर सपना
और दूसरा बन गया काला और कड़वा सच,

बारिश से अब हम डरते हैं,
बाढ़ लाती थी उपजाऊ मिटटी
पर अब सब बहा ले जाती है,
और बस दहशत छोड़ जाती है,
हवा, पानी, धरती
सब का रंग कहीं खो गया है,
कुछ और ही हो गया है,
साल में ६ ऋतुएं हुआ करती थी,
अब बसंत, पतझड़ कहीं खो गया है,

आज प्रकृति का सपना
और पर्यावरण का सच दूर रह गया,
हम तो आगे बढ़ गए,
पर हमारा मूल कहीं छूट गया,

जब भी कोई पर्यावरण की रिपोर्ट आती है,
हम चौकाने हो जाते हैं,
जैसे हमारे पापों का बहीखाता हो इस रिपोर्ट में,
फिर शुरू होती है माथापच्ची,
प्रकृति को साथ लेकर चलने की कसमें,
या मानते हैं हम पर्यावरण दिवस,
 ओजोन परत संरक्षण दिवस
कुछ देर बहस करते हैं,
विचार विमर्श करते हैं
और फिर भूल जाते हैं सब कुछ,
अगली बार के लिए,
अगले पर्यावरण दिवस के लिए,
अगली संगोष्ठी के लिए,
या जब हम फिर से प्रकृति को याद करेंगे,
और हमारे बच्चे हमसे पूछेगे कि वो क्या होती है

‘आपकामित्र’ गुरनाम सिंह सोढी
१७ सितम्बर, २०१२

हिन्दी दिवस

यह कविता मैंने आज से सात साल पहले लिखी थी…

आज के हिन्दी दिवस को मेरा शत शत नमन,
नमन उन सभी साहित्यकारों को जिन्होने इस भाषा के सौन्दर्य को और निखारा,
अपने शब्दों से जादू सा चलाने वाले उन कवियों को नमन,

नमन उस प्रकृति को, सूर्य को, चन्द्र को,
जो जाने कितने लेखों के, कवितायों के विषय बने,
किसी प्रेमी की भावनाओं का वर्णन करते उन फूलों को नमन,

किसी आँदोलन की आग भड़काने से लेकर
मु्र्दों मे जान फूकने वाले वीर रस के काव्य को नमन,
नमन उन प्रेम ग्रन्थों को, उन मार्मिक भावनाओं को नमन,

मेरे अन्दर मृत पड़ी भावनाओं के सागर मे मंथन करने वाले उस हिमालय को नमन,
मेरे शब्दों का विषपान करने वाले समाज और उसकी भावनाओं से
अमृतपान करने वाली पुण्य आत्माओं को नमन,

नमन मेरा तुझे ऐ मेरी लेखनी,
और फूल पत्तियों से बने इस हमसफर कागज़, तुझे भी मेरा नमन,

इस अलंकृत भाषा को मेरा शत शत नमन,

-नमनकर्ता
‘आपकामित्र’ गुरनाम सिहं सोढी

Faith

A lonely fruit shop,
near a busy road,
no one stopped to eat,
no one even noticed the shop,

shopkeeper opened it daily and then veiled,
but all his efforts just failed.

He then thought of something,
and picked up a stone,
decorated it with flowers,

colored it with vermilion,

He put it under a tree near his shop,
with an earthen lamp and incense stick,
with few bricks and mud

made a small temple around it.


Now everyone stopped,
bought fruits and prayed,
selling same fruits again,

“Recycled Faith” developed as a trade,


A busy fruit shop,
near a busy road,
adjacent to a divine temple,
with a protector God,


The creator of that God,
prays there in the morning,
to restore
his faith of selling faith.

🙂 aapkamitrgss
Gurnam Singh Sodhi
10th September, 2012

True Friends

Two friends,
Milk And Water,
together they are one,
nothing separates them,
or identify them apart,
one gives his identity to other,
the colour,
the taste,
his entire self.

Water, also a true friend,
when boiled, 
it comes to save his friend,
gives his life,
loses himself to vapors,

And upset milk,
tries to follow his friend,
falls and falls out of the container,
burning hot,
nothing can calm him,
but only a sprinkle of water,
a touch of his friend,
a comforting hand on his shoulder,
that they will be together again.

🙂 aapkamitrgss
Gurnam Singh Sodhi
8th September, 2012