प्रकृति और पर्यावरण

क्या याद आता है?
प्रकृति शब्द सुनते ही?
बाग बगीचे, रंग बिखेरते फूल और फल,
झरने और बहती नदियाँ कल कल,
चेह्चाहते पक्षी, गुनगुनाती कोयल,
पर कभी खुद को इसका हिस्सा नहीं देखा हमने,
देखा तो बस इन्हें प्यार और अचरज से देखते हुए,
हमारा विवेक भी सच जनता है,

और क्या देखते हैं हम,
पर्यावरण सोचने पर?
प्रदूषण, कल कारखाने,
विलुप्त पक्षी, मरती मछलियाँ,
चारो तरफ गाडियां और धुआं,
और ये सब करते हम,

प्रकृति और पर्यावरण अलग कब हुए,
कैसे रह गया कोई पीछे,
और कैसे दुसरे का ये हाल हुआ,
एक रह गया हमारा सुन्दर सपना
और दूसरा बन गया काला और कड़वा सच,

बारिश से अब हम डरते हैं,
बाढ़ लाती थी उपजाऊ मिटटी
पर अब सब बहा ले जाती है,
और बस दहशत छोड़ जाती है,
हवा, पानी, धरती
सब का रंग कहीं खो गया है,
कुछ और ही हो गया है,
साल में ६ ऋतुएं हुआ करती थी,
अब बसंत, पतझड़ कहीं खो गया है,

आज प्रकृति का सपना
और पर्यावरण का सच दूर रह गया,
हम तो आगे बढ़ गए,
पर हमारा मूल कहीं छूट गया,

जब भी कोई पर्यावरण की रिपोर्ट आती है,
हम चौकाने हो जाते हैं,
जैसे हमारे पापों का बहीखाता हो इस रिपोर्ट में,
फिर शुरू होती है माथापच्ची,
प्रकृति को साथ लेकर चलने की कसमें,
या मानते हैं हम पर्यावरण दिवस,
 ओजोन परत संरक्षण दिवस
कुछ देर बहस करते हैं,
विचार विमर्श करते हैं
और फिर भूल जाते हैं सब कुछ,
अगली बार के लिए,
अगले पर्यावरण दिवस के लिए,
अगली संगोष्ठी के लिए,
या जब हम फिर से प्रकृति को याद करेंगे,
और हमारे बच्चे हमसे पूछेगे कि वो क्या होती है

‘आपकामित्र’ गुरनाम सिंह सोढी
१७ सितम्बर, २०१२

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