मुस्कान

इक मुस्कान के पीछे क्या क्या छुपा रखा है,
अपने दुपट्टे को ही नकाब बना रखा है,

छुपा रहे हैं कुछ बेशकीमती यकीनन,
अपने होटों पे मुस्कान का दरबान बिठा रखा है,

कहीं कोई पढ़ ना ले गीली आखों कि किताब,
ध्यान बांटने के लिए मुस्कान को लगा रखा है,

आखों को तो झूठ बोलना सिखा ना सके,
बाकी चेहरे को इक मुकम्मल इंसा बना रखा है,

हर सवाल का नया जवाब हर बार,
दिल में बहानो का गोदाम बना रखा है,

ये भी नहीं कि सच कहने की हिम्मत नहीं,
फिर भी झूठ को अपना ईमान बना रखा है,

मोहूबत उनको भी है और हमे भी उनसे,
फिर क्यों इक दुसरे को इस से अन्जान बना रखा है.

उनकी बेरुखी का ना पूछो हम पे असर,
दिल की हर महफ़िल को शमशान बना रखा है,

कोई दिया जलाये तो हमे भी उजाला हो नसीब,
इंतज़ार में अपने आँगन को वीरान बना रखा है,

मुस्कुरा के कर को इज़हार-ए-मोहोब्बत,
कहो इस झिझक, इस शर्म-ओ-हया में क्या रखा है,

आखों में उतर जाने दो होटों की हंसी,
इस गम को चेहरे पे क्यों सजा रखा है,

छोड़ो शिकवे और लग जाओ महबूब के गले,
आना की जिद्द में दो दिलों को जुदा रखा है.

‘आपकामित्र’ गुरनाम सिंह सोढी
२१ सितम्बर, २०१२

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4 thoughts on “मुस्कान

  1. dr.mahendrag says:

    उनकी बेरुखी का ना पूछो हम पे असर,दिल की हर महफ़िल को शमशान बना रखा है,सुन्दर रचना

  2. Bahot khoob Gurnam Ji 🙂 आखों को तो झूठ बोलना सिखा ना सके,बाकी चेहरे को इक मुकम्मल इंसा बना रखा है, Beautiful lines.. 🙂

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