बादल

जब भी मन अशांत होता है,
तुम अपने घर की छत पे चले जाते हो,
आसमान की तरफ देखते हो,
चाँद तारों को,
भगवान से भी बात कर लेते हो,
बिना उसे देखे,
पर कभी बादलों की व्यथा देखी है?

सुबह हुई,
चिडियाँ चहचहा उठी,
सब चल दिए अपनी दिनचर्या पर,
शाम हुई तो लौट आये,
अपने अपने घरौंदों में,
सबका अपना ठिकाना जो है,

पर बादलों का कोई ठिकाना नहीं,
कोई घर नहीं,
वो हमेशा सफ़र पर हैं,

ये भी हम जैसे हैं,
अलग अलग रूप में,
इन्हें भी रंग पसंद हैं,
कभी काले तो कभी सफ़ेद,
कभी सूरज को छुपाते,
तो कभी इन्द्रधनुष बनाते,
ये भी चाँद से बातें करते हैं,
रात में फूलों पत्तियों को भिगो देते हैं,

पर याद हमे इनकी तभी आती है
जब धरती को प्यास लगती है,
इन्हें हमेशा कोसा जाता है,
ना बरसें तो भी, ज्यादा बरसें तो भी,

और ये मासूम बादल,
बस भटकते रहते हैं,
इधर से उधर,
क्योंकि ये अपना घर बनाना भूल गए थे,
शाम को वापिस जाने के लिए,
जिनका कोई घर नहीं होता,
उनकी कोई इज्ज़त नहीं करता..

 ‘आपकामित्र’ गुरनाम सिंह सोढी
२० अक्टूबर, २०१२

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सुबह

सुबह का मंज़र,
सब शांत,
पर यह क्या,
आसमां की कालिमा में,
एक कोना लाल सा हो गया है,

लगता है दूर कहीं आग लगी है,
रात को तो सब ठीक था,
एक कहानी सुना कर
चाँद ने सब को सुलाया था,

चिडियाँ भी उस कोने को छोड़
शोर मचाती, सब को बताती
उड़ चली हैं,
डर गयी हैं वो भी,

आग बढ़ रही है,
सबकी शांत नींद टूट गयी,
कई लोग मंदिरों, मस्जिदों में पहुँच गए हैं,
भगवान से प्रार्थना कर रहे हैं,
कि वो ही इस आग को बुझायें,
पर कोई फायदा नहीं,
आग बढ़ रही है,
धुंए के बादल आसमान पर दिख रहे हैं,
आग की तपिश धरती को जला रही है,

लोग इधर उधर भाग रहे हैं,
अलग तरह के शतुरमुर्ग हैं ये,
सोचते हैं कि वो आग को नहीं देखेंगे,
तो आग भी उन्हें नहीं देख पायेगी,
और एक जगह रुकेंगे नहीं
तो जलने से बच जायेंगे,

चाँद भी जाने कहाँ गया,
वही है जो इस आग को बुझा सकता है,
अपनी ठंडक से,
जंगल की आग है दूर कहीं,
पूरा दिन लग जायेगा इस बुझाते हुए,
और पूरी शाम सबको शांत करते हुए,
तब कहीं सब सो पाएंगे,
चाँद से मीठी लोरी सुनने के बाद

‘आपकामित्र’ गुरनाम सिंह सोढी
७ अक्टूबर, २०१२

चूल्हा

मिट्टी का चूल्हा,
कुछ लकड़ियाँ,
गोबर की पाथियाँ,
ज़रा सा मिट्टी का तेल,
और एक माचिस कि डिबिया,
बस?
नहीं! इतना भर नहीं है ये चूल्हा,
इस पर सिर्फ खाना नहीं,
सपने भी पकते हैं,
आने वाले कल के,
मीठी मीठी आँच पर,
 

जिसके घर चूल्हा जला,
उस दिन वही अमीर,
सबसे पहले जलने वाले चूल्हे की इज्ज़त थी,
उसकी आग बंटती थी प्रसाद की तरह,
मोहल्ले के बाकी चूल्हे जलाने के लिए,
और अंत में इससे मिलती थी काली राख,
बर्तनों की कालिख मिटाने के लिए,

चूल्हे का ख्याल भी रखा जाता था,
हर महीने उस पर मिट्टी का लेप होता था,
उसकी कालिख पोंछी जाती थी,
पूजा भी होती थी त्योहारों पर,
बदले में ये भी ख्याल रखता था सबका,
कई पीढ़ियों का पोषण किया है इसने,

फिर गैस आई तो इसकी कीमत कम हो गयी,
जैसे कोई बुज़ुर्ग की,
सठिया गया हो वो जैसे,
इसका धुआं, इसकी कालिख,
अखरने लगी थी सबको,
वो अमीरी वाला चूल्हा
अब गरीबों का आसरा रह गया बस,
या गरीबों के आसरे रह गया वो शायद,

पर अब भी इसने हार नहीं मानी,
अभी भी बर्तनों के ज़रिये,
या पुराने लोगो के सपनो में आकर,
सबको याद कराता है,
कि दाल हो, खीर हो, या सरसों का साग,
असली स्वाद तो चूल्हे पर पक कर ही आता है,
फिर शादी ब्याह में जैसे बड़े बूढों की
इज्ज़त बढ़ जाती है,
ये चूल्हा भी निकल आता है फिर,
अपना तजुर्बा दिखने के लिए,
अपनी मीठी मीठी आँच के साथ,
मिट्टी का ये चूल्हा….

‘आपकामित्र’ गुरनाम सिंह सोढी
४ अक्टूबर, २०१२