चूल्हा

मिट्टी का चूल्हा,
कुछ लकड़ियाँ,
गोबर की पाथियाँ,
ज़रा सा मिट्टी का तेल,
और एक माचिस कि डिबिया,
बस?
नहीं! इतना भर नहीं है ये चूल्हा,
इस पर सिर्फ खाना नहीं,
सपने भी पकते हैं,
आने वाले कल के,
मीठी मीठी आँच पर,
 

जिसके घर चूल्हा जला,
उस दिन वही अमीर,
सबसे पहले जलने वाले चूल्हे की इज्ज़त थी,
उसकी आग बंटती थी प्रसाद की तरह,
मोहल्ले के बाकी चूल्हे जलाने के लिए,
और अंत में इससे मिलती थी काली राख,
बर्तनों की कालिख मिटाने के लिए,

चूल्हे का ख्याल भी रखा जाता था,
हर महीने उस पर मिट्टी का लेप होता था,
उसकी कालिख पोंछी जाती थी,
पूजा भी होती थी त्योहारों पर,
बदले में ये भी ख्याल रखता था सबका,
कई पीढ़ियों का पोषण किया है इसने,

फिर गैस आई तो इसकी कीमत कम हो गयी,
जैसे कोई बुज़ुर्ग की,
सठिया गया हो वो जैसे,
इसका धुआं, इसकी कालिख,
अखरने लगी थी सबको,
वो अमीरी वाला चूल्हा
अब गरीबों का आसरा रह गया बस,
या गरीबों के आसरे रह गया वो शायद,

पर अब भी इसने हार नहीं मानी,
अभी भी बर्तनों के ज़रिये,
या पुराने लोगो के सपनो में आकर,
सबको याद कराता है,
कि दाल हो, खीर हो, या सरसों का साग,
असली स्वाद तो चूल्हे पर पक कर ही आता है,
फिर शादी ब्याह में जैसे बड़े बूढों की
इज्ज़त बढ़ जाती है,
ये चूल्हा भी निकल आता है फिर,
अपना तजुर्बा दिखने के लिए,
अपनी मीठी मीठी आँच के साथ,
मिट्टी का ये चूल्हा….

‘आपकामित्र’ गुरनाम सिंह सोढी
४ अक्टूबर, २०१२

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