बादल

जब भी मन अशांत होता है,
तुम अपने घर की छत पे चले जाते हो,
आसमान की तरफ देखते हो,
चाँद तारों को,
भगवान से भी बात कर लेते हो,
बिना उसे देखे,
पर कभी बादलों की व्यथा देखी है?

सुबह हुई,
चिडियाँ चहचहा उठी,
सब चल दिए अपनी दिनचर्या पर,
शाम हुई तो लौट आये,
अपने अपने घरौंदों में,
सबका अपना ठिकाना जो है,

पर बादलों का कोई ठिकाना नहीं,
कोई घर नहीं,
वो हमेशा सफ़र पर हैं,

ये भी हम जैसे हैं,
अलग अलग रूप में,
इन्हें भी रंग पसंद हैं,
कभी काले तो कभी सफ़ेद,
कभी सूरज को छुपाते,
तो कभी इन्द्रधनुष बनाते,
ये भी चाँद से बातें करते हैं,
रात में फूलों पत्तियों को भिगो देते हैं,

पर याद हमे इनकी तभी आती है
जब धरती को प्यास लगती है,
इन्हें हमेशा कोसा जाता है,
ना बरसें तो भी, ज्यादा बरसें तो भी,

और ये मासूम बादल,
बस भटकते रहते हैं,
इधर से उधर,
क्योंकि ये अपना घर बनाना भूल गए थे,
शाम को वापिस जाने के लिए,
जिनका कोई घर नहीं होता,
उनकी कोई इज्ज़त नहीं करता..

 ‘आपकामित्र’ गुरनाम सिंह सोढी
२० अक्टूबर, २०१२

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3 thoughts on “बादल

  1. वाह! एक अलग नजरिया सोचने का..जिनके घर नहीं होते उनकी इज्ज़त नहीं होती.. बहुत बढ़िया..

  2. धन्यवाद प्रतीक जी 🙂

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